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लडकियो को कैसे फसा कर बेचा जाये - देह व्यापार की कला नेपाल से जीबी रोड तक

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ग़ायब होती लड़कियाँ: नेपाल से जीबी रोड तक

नाकढुंगा नाका: काठमांडू से बीस किलोमीटर दूर भारत-नेपाल सीमा की ओर जाने वाली सड़क के एक चेकपोस्ट पर बसों, ट्रकों और कारों को रोककर उनकी तलाशी ली जा रही है.

दिलचस्प बात ये है कि तलाशी लेने का काम कम उम्र की लड़कियाँ कर रही हैं. मदद के लिए वहाँ महिला पुलिस मौजूद है.

मानव तस्करी विरोधी संगठन मइती नेपाल की ये कम उम्र कार्यकर्ता बसों में चढ़कर उसमें सवार लोगों की बारीक पड़ताल करती हैं.

एक बस में उन्हें अकेले सफ़र करते एक नाबालिग दिखने वाली लड़की मिलती है, जिसे पूछताछ के लिए उतार लिया जाता है. फ़ोन पर उसके माता-पिता से पूरी तस्दीक करने के बाद ही उसे जाने दिया जाता है.

जीबी रोड, दिल्ली: शटर बंद दुकानों के बीच से सँकरी सीढ़ियाँ चढ़कर दिल्ली पुलिस के लोग धड़ाधड़ कोठा नंबर 64 में जाते हैं. पुलिस को देखकर वेश्याओं की तलाश में ऊपर पहुँचे आदमी घबरा कर नीचे उतरते है.

पुलिस वाले किसी को थप्पड़, किसी को लाठियाँ तो किसी को गालियाँ देते हुए भगा देते हैं.

उनके साथ मानव-तस्करी विरोधी सामाजिक संस्था के लोग हैं जो नेपाल से लाई गई लड़कियों की शिनाख़्त करके उन्हें बचाने के काम में लगे हैं.

थोड़ी देर बाद सिर-मुँह को कपड़े से ढके हुए कुछ नौजवान लड़कियाँ पुलिस वालों के साथ नीचे उतरती हैं. उन्हें सीधे कमला मार्केट थाने ले जाया जाता है. ये सभी लड़कियाँ नेपाल से यहाँ लाई गई हैं. पर उनमें से कोई भी ये स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उन्हें जबरन लाया गया है.

रास्ता

नेपाल के दूर-दराज़ गाँवों से दिल्ली के जीबी रोड के कोठों तक जाने वाला ये रास्ता ग़रीबी से बचने की कोशिश कर रही लड़कियों को हताशा और अंधकार की ओर ले जाता है.

इस रास्ते से हर साल सैकड़ों लड़कियाँ नेपाल से भारत-नेपाल की सीमा तक पहुँचाई जाती हैं और फिर उन्हें भारत के दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता और पुणे जैसे शहरों में पहुँचा दिया जाता है.

मइती नेपाल की प्रमुख अनुराधा कोइराला कहती हैं, “नेपाल के 11 नाकों (चेक पोस्ट) पर हमारे कार्यकर्ता मौजूद रहते हैं और रोज़ाना औसतन एक चेक पोस्ट से चार से पाँच लड़कियों को रोका जाता है.”

यानी रोजाना लगभग 50 लड़कियों को इन नाकों से बचाया जाता है. महीने में डेढ़ हज़ार लड़कियाँ इस तरह रोकी जाती हैं, पर उन लड़कियों के बारे में कोई आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं जो नेपाल-भारत की खुली सीमा के पार भेज दी जाती हैं.

इनमें से कई लड़कियाँ नौकरी और अच्छे भविष्य के झाँसे में घर के बाहर क़दम रखती हैं, तो कई को प्रेम संबंधों में फँसा कर वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है.

शारदा (नाम बदला हुआ) ऐसी ही लड़कियों में है जिन्हें एक नहीं बल्कि दो-दो बार बेचा गया.

गुर्दे का व्यापार

पिछले पाँच साल से वो काठमांडू में मइती नेपाल के एक शेल्टर होम में रहती हैं. शारदा की कहानी उन नेपाली युवतियों की कहानी है जो गरीबी से निकलने के लिए हताशा और अंधकार में क़दम रख देती हैं.

वो सिर्फ़ 14 साल की थीं जब उन्होंने अपने क़र्ज़दार पिता का बोझ उतारने के लिए काठमांडू आकर सिलाई का काम करने का फ़ैसला किया.

वहां उन्हें संजय नाम का लड़का मिला जिसने अच्छी नौकरी का झाँसा दिया.

शारदा ने बीबीसी को बताया, “संजय ने मुझे एक दिन कोका कोला पिलाया और मैं बेहोश हो गई. आँख खुली तो मैं चेन्नई के एक अस्पताल में भर्ती थी. मेरा गुर्दा निकाल लिया गया था, लेकिन मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया गया. मुझसे कहा गया कि मेरा ख़ून ख़राब था जिसे बदल दिया गया है.

शारदा कहती हैं कि काठमांडू लौटने पर उनके साथ जबरदस्ती की गई.

“मैं जहाँ सोई हुई थी, वहीं राजेश नाम के एक लड़के ने मेरी माँग में जबरदस्ती सिंदूर भर दिया.”

वो कहती हैं कि ये शादी महज़ एक छलावा थी. शारदा को इस छलावे का तब पता चला जब राजेश उन्हें दिल्ली लाया, लेकिन ख़ुद ग़ायब हो गया. बाद में शारदा को अंदाज़ा हुआ कि वो कोठे में हैं और उन पर ‘धंधा’ करने का दबाव पड़ने लगा.

अमानवीय यंत्रणाओं का दौर

तब तक शारदा का बच्चा भी हो चुका था. उन्हें बच्चे से अलग कर दिया गया और कुछ समय बाद दिल्ली से कलकत्ता भिजवा दिया गया.

“कलकत्ता में लाठियों से मेरी पिटाई की जाती थी. मुझे सिगरेटों से दाग़ा जाता था. मेरे बच्चे की जीभ को सिगरेट से जलाया जाता था”, शारदा आज भी उन लम्हों को याद करके सिहर उठती है.

नेपाल से मानव तस्करी का मामला कभी रहस्य के आवरण में ढँका नहीं रहा. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लेकर काफ़ी हंगामा हो चुका है, फ़िल्में बनी हैं और लड़कियों की गवाहियाँ हुई हैं.

फिर भी ये तस्करी बंद नहीं होती.

नेपाल पुलिस के प्रवक्ता और उप महानिरीक्षक केशव अधिकारी ने बीबीसी को बताया, “मानव तस्करी करने वाले बहुत सारे लोगों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है. अगर उन्हें ये संरक्षण मिलना बंद हो जाए तो उन्हें सज़ा दिलवाना आसान होगा.”

उन्होंने बीबीसी हिंदी से बातचीत के दौरान इस बात की पुष्टि की कि पुलिस के पास ऐसे मामले भी आए हैं जिनमें लोगों को बिना बताए उनके गुर्दे निकाल लिए गए.

मइती नेपाल की अनुराधा कोइराला बताती हैं कि अब तक उनके संगठन ने पुलिस के साथ मिलकर कुल मिलाकर 25,000 लड़कियों को मानव तस्करों के हाथों से बचाया है.

उन्होंने बताया कि तस्करी की शिकार एक लड़की कई हाथों से होकर गुज़रती है और सिर्फ़ नेपाल के भीतर ही एक लड़की पर कम से कम दो लाख रुपए ख़र्च कर दिए जाते हैं. एक बार जब लड़की को सीमा पार करवा दी जाती है तो उसपर और कीमत लगाई जाती है.

लेकिन इस अंधकार से निकलने में कामयाब हुई शारदा जैसी लड़कियों को कभी तस्करी के इस पूरे तंत्र के ओर छोर का पता ही नहीं चल पाता.

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