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किसी एक महिला की सुनायी दास्ताँ मैं अपने तरीके से लिख रही हूँ। मैं अंजू, अब 32 साल की हूँ। पति से तलाक नहीं हुआ है पर अब मुझे उससे अलग रहना पड़ रहा है। मेरा बाप अभी पिछले साल ही शरीर छोड़ गया है। भगवान करे उसे सद्गति प्राप्त हो; वैसे वह उस लायक है या था नहीं

हम चार बहनें और दो भाई हैं। मेरी सबसे बड़ी बहन साँवली और मोटे नैन-नक्श वाली हैं। बिलकुल हमारे 'पापा' की तरह। बाकी सारे भाई-बहन कुछ और ही तरह के रंग-रूपवाले हैं। भक्क भूरे और बारीक़ नाक-नक्शवाले। बिलकुल उस 'ताऊ' की तरह जो हमारे बचपन में हमारे घर अक्सर आते-जाते रहते थे।
मुझे बाद में पता चला कि 'ताऊ' ही असल में हम सभी के बाप थे। बड़ी बहन को छोड़ के। मेरी माँ ने हमारे बाप की जानकारी में पैसों के लिए मालदार ताऊ को खसम बना रखा था। उन्ही के संग 'सोती' थी। हमारे बाप को तो वह नजदीक भी नहीं फटकने देती थी। यह सिलसिला ताऊ के आजीवन चलता रहा था। समय के साथ हम पांच भाई-बहन एक-एक करके पैदा होते चले गए। हमारे जवान होने से भी पहले एक दिन ताऊ जी भी हमें छोड़ कर दुनिया से ही चले गए।
कोई दो बरस बाद जब हमारी बड़ी बहन की शादी आयी तो मेरे बाप ने एक दिन मुझे अपने साथ कहीं चलने के लिए कहामाँ ने भी कहा- 'कायदे' के कपड़े पहन के जाना! थोड़ा मेक-अप भी कर ले अच्छा ही रहेगा।
तब मुझे पूरा समझ में नहीं आया की मामला क्या है। हम किशोरी सेठ की हवेली पर गए। उसकी उम्र मेरे से कोई ढाई गुनी ज्यादा थी। वह हम दोनों को ही अपने शानदार अटैच्ड बाथवाले बेडरूम में ले गया। मुझे अपने पास बिठा के मेरे कंधे-पीठ वगैरह सहलाने लगा। मेरे बाप के सामने ही एक बार मेरी चूचियों को भी दबाया। अब मुझे डर लगने लगा। मैंने कई बार चोरी-छिपे देखा था कि ताऊ भी मेरी मम्मी को पहले ऐसे ही सहलाते थे। फिर कपड़े उतारते और बाद में मम्मी पर चढ़ जाते थे। तो क्या यह बुड्ढा मेरे भी कपड़े उतारेगा? मुझ पर चढ़ेगा? मुझे चोदेगा? मेरा बाप ताऊ से भी कुछ नहीं कहता था। यहां भी चुप बैठा था।
किशोरी ने अचानक अपनी एक हथेली में मेरे गाल को लेते हुए दूसरी को चूम लिया। फिर मेरी चूचियों को सहलाते हुए मेरे बाप से कहने लगा- लड़की तो जैसी तुमने बताया था वैसी ही मस्त है। मुझे भी लगता है अभी कुंवारी है- चुदी नहीं है। इसलिए भी तुम यहीं रहना। कहीं चिल्ल-पों ना करने लगे। इसे सब समझा दिया है कि नहीं? फिर उसने मेरे होंठ चूसना शुरू कर दिया। मैं विरोध में थोड़ी कसमसाई। लेकिन वह लगा रहा।
अब मेरे समझ आया कि मेरा बाप मुझे यहाँ चुदवाने ले आया है और इस सौदे में मेरी माँ की भी सहमति है। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए!
किशोरी अब मेरी चूचियों को जोर से दबाते हुए मुझपे लदरने लगा था। उसने मेरी समीज उतारना शुरू किया तो एक बार मैंने थोड़ा प्रतिरोध सा किया। मेरे हरामखोर बाप ने तुरंत कहा- उतार दे बेटा, कोई बात नहीं!

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मैं रंडीपने को राजी हो गयी 
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उसकी बात सुनते ही जाने क्या हुआ कि मैं एक पल में बदल गयी। मैंने तय कर लिया कि जब मेरा बाप ही चाहता है तो अब मैं एक कामयाब धन्धेवाली बनूँगी। अच्छा पहनना-खाना भी करुँगी और सरेआम इसके सामने ही आये दिन चुदुंगी। माँ का भी 'नाम रोशन' करुँगी। आखिर हर किसी की बेटी रंडी नहीं होती! वैसे भी ताऊ के साथ उसकी नजदीकियों की चर्चा आज भी होती ही है।
किशोरी को थोड़ा परे धकेलते हुए मैं खड़ी हो गयी और खुद अपनी समीज को उतार कर अलग रख दिया। फिर अंदर की कुर्ती भी उतार दी। बाप के सामने ही। जब उसे कोई हया-शरम नहीं तो मुझे ही क्यों हो? ब्रा तो तब तक मैं पहनती ही नहीं थी; या कहो मुझे मिलती ही नहीं थी। अब मैं कमर से ऊपर बिलकुल नंगी थी।
वैसे भी मेरी उतनी उमर तो हो ही गयी थी जब जवान शरीर में सेक्स की लहरें उठने लगती हैं। चुदना तो मैं भी चाहने लगी थी- पर मालुम न था कि मेरे सेक्स जीवन की शुरुआत ऐसे होगी। अभी तो मुझे किशोरी सेठ से चुदना ही था- मैंने आगे का भी प्रोग्राम बनाना शुरू कर दिया। मेरे पड़ोस में ही एक जवान लड़का महीनों से मुझ पर डोरे डाल रहा था। लिहाज शरम के मारे मैं रुक रही थी। मेरे माँ-बाप ने ही उसकी धज्जियाँ उड़ा दी। मैंने तय किया कल दोपहर में ही उस लड़के के घर जाउंगी। उस समय वह अकेला होता है। बाप के प्रति नफरत की आँधी में मेरे मन में एक शैतानी विचार पैदा हुआ।
किशोरी अब मेरी नन्हीं, जवान चूचियों को चूसने लगा था। मैंने उसे थोड़ा रुकने का इशारा किया और सोफे पर बैठते हुए उसकी गोद में अपना सर रख दिया। फिर अपने पैरों को बाप की गोद में टिका कर मैंने बिलकुल बेअदबी से कहा- अब सलवार का नाड़ा खोलने की रस्म भी पूरी कर दो!
किशोरी ठठा के हँसते हुए अपने कपड़े उतारने लगा और बोला- मजा आ गया छोरी! कमाल की चीज है तू तो!
मेरे बाप ने धीरे से नाड़ा खोल के मुझे छोड़ना चाहा। मैं भड़क गयी- हरामखोर, जिंदगी भर तूने सिर्फ तास के पत्ते पलटे हैं और सट्टा खेला है। अब बिटिया की शादी करनी है तो मेरी गांड मरवाने ले आया है। अब आज से मैं रंडी हूँ, रंडी! अभी देख तो सही मैं क्या-क्या करनेवाली हूँ! चल खींच के उतार मेरी सलवार।
मेरा रौद्र-रूप देखकर मेरा बाप, मोहनलाल, सकपका गया। उसने मेरी सलवार को नीचे सरकना शुरू कर दिया। अब मैं सिर्फ एक पुरानी चड्ढी में थी। मैंने उसे खुद उतारना चाहा। तभी किशोरी बोल उठा- अरे नहीं; इसे तो मैं उतारूंगा! क्या गजब का फिगर है तेरा। रंडी के बजाय तू मेरी रखैल बन जा!
मैं मुस्कराते हुए सीधी होकर बैठ गयी। फिर बाप की गोद में सिर रखकर किशोरी की तरफ पैर करके लेटते हुए बोली- सेक्स के मतलब से यह चड्ढी पहली बार उतरने जा रही है। उतराई क्या दोगे?
किशोरी बोला- मैंने तेरे बाप को काफी पैसा दे रखा है।
मैंने बेपरवाही कहा- तो उसी की गांड मार ले! मुझे भी बड़ी ख़ुशी होगी।
किशोरी ठठा के हँसते हुए बोला- चल, तू ही बता दे मैं क्या दूँ?
मैं संजीदा हो गयी। बोली- मुझे पता है कि मेरी बहन की शादी है और घर में पैसे का कोई प्रबंध नहीं है। ताऊ जिन्दा होते तो सब काम हो जाता। इसलिए पैसे तो तू इसी हरामखोर को दे। मुझे बस तीन-चार जोड़ी पैंटीज और ब्रा की ला देना। मुझे इन पुरानी पैंटीज में बड़ी शर्म आ रही है।
"अरे! बस, इतनी सी बात! आज ही ले। अच्छी-से-अच्छी। चाहे जितनी कीमती! अब मेरा लौड़ा चूस-मैं तुझे चोदने को बेकरार हुआ जा रहा हूँ।"
फिर मेरी कमर के दोनों बगल से उसने मेरी चड्ढी को पकड़ के उतारना शुरू कर दिया। बाप ने मुझे पहले बता दिया होता तो शायद मैं यहां आती ही नहीं। लेकिन आती तो चूत के इर्द-गिर्द उगे घने झांटों की सफाई करके आती। किशोरी को भी मेरे झांट पसंद नहीं आये; या फिर वह मेरी भावनाओं को ताड़ के मेरे बाप को शर्मिंदा करना चाहता था। बोला- अरे मोहनलाल, यह क्या? तुमने इसकी सफाई तक नहीं करायी? ऐसी घनी झांटों के होते मैं इसकी चूत चाटूंगा कैसे? फिर बाथरूम की तरफ इशारा करते हुए कहा- चलो, अंदर से रेजर ले आओ!
मेरे बेशरम बाप का भी चेहरा उतर गया था। वह चुपचाप बाथरूम की तरफ बढ़ गया। ढूंढ के रेजर ले आया। किशोरी ने बड़ी बेरुखी से मेरे बाप को कहा- चल तू खुद इसके झांटों की सफाई कर दे। मैं फ्रेश होकर आऊँ!
किशोरी बाथरूम में चला गया जबकि मैं मन ही मन में मुस्कराती हुई चुपचाप पड़ी रही।

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मूड बनना शुरू हो गया 
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बाप के हाथों से मेरे जवान चूत की सेवा का विचार ही मेरे मन में सनसनी पैदा करने लगा था। मैंने महसूस किया कि मेरी चूत में अनायास ही गीलापन पैदा हो गया है। मोहनलाल ने मग्गे से थोड़ा पानी लेकर मेरी झांटों पर डाला और सहलाने लगा। मैं इतनी तरंग में आ गयी कि मुझे लगा छूट ही न जाऊं! मैंने अपने पैरों को और भी चौड़ा फैला दिया और बोली- पहले अच्छी तरह से रगड़ लो!
मेरे बाप का धैर्य जबाब दे गया। भड़क के बोला- मैं नहीं जानता था कि तू इतनी तैयार हो गयी है। साली, अपने पे आ गया तो तुझे पेले बिना नहीं छोड़ूंगा। वैसे भी तू जानती ही है कि मैं तेरा कोई असली बाप नहीं हूँ!
मैं बोली- तभी तो मुझे बेचने ले आया है!
उसका गुस्सा काफूर हो गया- नहीं लैला, ऐसी कोई बात नहीं। मेरी मजबूरी है। मुझे इतना बेगैरत मत समझ! मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ! तू मेरा यकीन मान!
तभी सेठ आ गया। चोदने को बिलकुल तैयार!  न जाने बाथरूम क्या करके आया था कि उसका अधेड़ उम्र का लंड भी आजादी के झंडे की तरह तन कर खड़ा था। उसने मेरे बाप के हाथ से रेजर और पानी का मग्गा ले लिया। फिर बड़े प्यार से अपनी उँगलियों को पानी में डुबो कर मेरी चूत पर रगड़ने लगा!
"उईई माँऑ !!" कहते हुए एक बार तो छूट ही गयी। मेरी चूत मेरे कामरस से तरबतर हो गयी। मेरी दशा का अनुमान करके किशोरी ने चूत के बालों को छीलने का विचार त्याग दिया और मुझे पेलने की तैयारी करने लगा। उसने मुझे सोफे पर ही पीठ के बल लिटा दिया और मेरा सिर मेरे बाप की गोद में रखवा दिया। फिर मेरी टाँगें फैला कर एक पैर सोफे की पीठ पर और दूसरा जमीन पर टिका के मेरी चूत